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Sunday, 13 July 2014

संध्या




किरण फिसली - फिसली और थम गयी
पेड़ों के अक्षत - निस्तब्ध शाख पर
चुहल करने लगी
शाख से, हर पात से-
कभी इस पर
कभी उस पर
अस्ताचलगामी सूर्य ने पुकारा
’अरी ओ चली आओ'
तत्क्षण किरण ठिठकी
मुड़ी
सिमटी सिकुड़ी
पक्षियों के कलरव - गान सुनती
मृगछौने - सी कुलाचें भारती
अस्ताचल को सरपट लौट गयी |

(पिताश्री की ये कविता हिन्दीनेस्ट.कॉम पर ०९ अगस्त, २००३ को प्रकाशित हुई थी)

Saturday, 12 July 2014

प्रात:काल

 

हर प्रफुल्ल पात से

टप-टप कर

शनैः – शनैः

टपक रहा

सुन्दर – मोहक

इन्द्रधनुषी ओस – कण |

 

इठलाती भागी जाती

प्रातिभ मलयानिल के

सुमधुर स्पर्श से पैदा होते

सुमधुर स्वर ……… सर सर |

कल कल …………. छल छल

बहती धारा का चंचल मन

दुग्ध -  फेन - सा निर्मल जल

प्रकृति – प्रान्तर में गूंज रहा

खग -  कुल का मधुर कलरव |

 

जल धारा के आर पार

क्षण का चित – चकोर

बहि:अंतर की आँखे खोलगुप - चुप निरख रहा चहुँओर

प्रकृति के ओर – छोर

हर पोर – पोर |

 

(पिताश्री की ये कविता हिन्दीनेस्ट.कॉम पर ०९ अगस्त, २००३ को प्रकाशित हुई थी)

Thursday, 6 February 2014

पूर्णिमा की रात

 
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देखा मैंने उस रात
सरोवर–तट पर
पारदर्र्शी दर्पण–सी
शुभ्र–शीतल जल में
चांद उतर आया था
कुमुदिनी की पंखुड़ियों के
कोमल स्पर्श से
अपने बदसूरत दाग मिटाने को चुपचाप ।

नीरव निर्जन प्रदेश में
मृदुहास लिये
चुपके से
जल विहार करते चाँद को
निर्वसन देखा था मैंने
शुभ्र ज्योत्स्नास्नात ।

रात के अंतिम पहर में
सुवासित कुंज की ओट से
चुपचाप जाते देखा–
मैंने सुन ली थी उसकी पदचाप ।



२४ दिसंबर २००३ को www.anubhuti-hindi.org पर प्रकाशित ।

Sunday, 19 January 2014

पृथ्वी–मंगल–युति (२००३) के प्रति


भागी जाती हवा से पूछा –
हे चंचला! क्यों उड़ी जाती हो ?
किधर को उड़ी जाती हो ?
किससे मिलने को आतुर मन जाती हो ?
रूकी नहीं तनिक भी
खिलखिलाती सरपट भाग गयी ।

धरती की हरियाली से पूछा –
अहा! कितनी मोहक तेरी जवानी ?
क्या मुझको देख विहँस रही हो ?
शरमा गयी! चुपचाप खेतों में दौड़ गयी ।

भागी जाती डैनों से आकाश नापती
क्यों कलरव करती जाती हो ?
इतना–सा ही जब चिड़ियों से पूछा –
किसने तुमको इतना सुंदर रूप दिया ?
किसने तुमका उड़ना सिखाया ?
थमी नहीं तनिक भी
पलक झपकते नीले नभ को नाप चली,
बस उसकी कलरव–अनुगूँज ही मेरे पास रही ।

‘अंगारक’ संग चमकते अमावस के तारों से पूछा – क्यों रात–रात भर टिमटिमाते हो ?
दिवस हुए कहाँ छुप जाते हो ?
क्या चंदा–संग मिल सूरज से
अबूझ आंख–मिचौनी करते हो ?
प्रत्युत्तर में बस आंखों में उसने सुरमई भर ली,
मंगल की चमक बढ़ और चली ।

गहरी काली निशा में दूर से आई एक आवाज ॐ
बोल उठा एक उलूक ही तत्क्षण –
‘कोऽहं – कोस्त्वं ……… कोऽहं – कोस्त्वं’ ‘मैं – मैं’ क्यों करता तू हरदम ।

२४ दिसंबर २००३ को www.anubhuti-hindi.org पर प्रकाशित ।

Friday, 3 January 2014

हाँफता हुआ शहर


उस दिन
सुबह–सुबह
पहाड़ के नीचे
ऊँचे टीले पर
खड़े होकर
शहर को गौर से देखा
तो गम में डूब गया
देखा –
काले धुएँ की छतरी तले
वह शहर बलगमी कलेजे से
बेतहाशा काँप रहा रहा था ।

कारखाने की
बड़ी–बड़ी चिमनियाँ
बेखौफ धुआँ
उगलती जा रही थी
और भय की मारी बेचारी
सुकुमारी मुटठी–भर प्यारी हवा
पहाड़ की गोद में दुबक आयी थी।
साफ–साफ दिख रहा था
चिमनियों की सुरसा–तले
सारा शहर बेतरह हाँफ रहा था
बेतहाशा काँप रहा था
पनाह माँग रहा था।

 
२४ दिसंबर २००३ को www.anubhuti-hindi.org पर प्रकाशित ।

Monday, 30 December 2013

नववर्ष अभिनंदन


भेजा ई-मेल
पूछा ओस्लो और अलास्का से
कैसा है नव वर्ष
कैसा रहा गत वर्ष
बोला बेहतर है
पूछो एस्किमो से
ध्रुवप्रदेश में छूट रहा था
रंगबिरंग अग्नि प्रदर्श
हिमखंड टूट कर बिखर रहा था
मंगल ग्रह से पूछा
तो वह चिहुँक उठा
देखो तेरे घर से आया
कौन है उतरा मेरे प्रांगण
आकाश गंगा और
ब्रह्मांड के सूर्येत्तर महासूर्य से
रेडियो भाव में पूछा'
तो रेडियो तरंग को शून्य पर
टिका हुआ ही पाया
होनोलुलू और होकाइडो के
मछुआरों को
चंद्रज्योत्स्नास्नात जलगात पर
मोटर ट्राली कसते पाया
भूकंपघात से त्रस्त निपात
'बम' शहर को थोड़ा सहलाया
पाया खुले आकाश के नीचे
आँसू व सिहरन भी ठहर गई है
गुलमर्ग खिलनमर्ग में
हिम क्रीड़ा यौवन खिलखिलाकर
मेरी ओर हिमकंदुक उछाल कर बोली
'सारे जहाँ से अच्छा
हिंदोस्तां हमारा'
मैं रम्यकपर्दिनि शैलसुता
हिम क्रीड़ा में
किस के साथ है मेरी तुलना समता
उत्तर अभिमुख अयन अंश पर
पूरे भूमंडल को
सर्द ठिठरन में ठिठका पाया
तब भी दिनमान का
स्वर्ण हिमपाखी
सत्वर उड़ता जाता
आओ हम सब
धरती को स्वर्ग बनाएँ
ओजोन परत में
कुछ रफू कराएँ
व्यापार विस्तार महत्वाकांक्षा तज
आतंकमुक्त चंद्र मंगल की ओर
धीरे-धीरे कदम बढ़ाएँ
हर दिन नव वर्ष के
प्रेम मंगल गीत हम गाएँ |


विनोद कुमार

जनवरी २००४ को www.anubhuti-hindi.org पर प्रकाशित ।

Thursday, 28 November 2013

उषा पान


लक्ष्मी की महिमा देखो

अचरज भरा करिश्मा देखो

जवानी की लत को बुढ़ापे में छोड़ा

उषःपान तज

‘बेड टी’ से नाता जोड़ा ।



२४ दिसंबर २००३ को www.anubhuti-hindi.org पर प्रकाशित ।

Sunday, 24 November 2013

विनिमय



वर्षांत में
एक संपादक ने
रोकड़ मिलाया –
व्यावसायिक पत्र के
साहित्य संपादक की
छह रचनाएँ छापकर
पाँच बार वहाँ
खुद को छपाया ।


२४ दिसंबर २००३ को www.anubhuti-hindi.org पर प्रकाशित ।